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18 September, 2014

बेरोजगारी: समस्या और समाधान : हिंदी निबंध

सर विलियम बैवरीज के अनुसार ‘‘संसार में पाँच आर्थिक राक्षस मानव जाति को ग्रसित करन के लिए तैयार हैं- निर्धनता, अज्ञानता, गन्दगी, बीमारी और बेरा जगारी, परन्तु इनमें बेरा जगारी सबस भयंकर है।’’ बेरोजगारी का अर्थ है, काम करन या ग्य एवं काम करने के इच्छुक व्यक्तिया ं के लिए काम का अभाव। कोई भी व्यक्ति ब रोजगार तब कहलायेगा, जबकि वह काम करने के या ग्य है तथा काम करना चाहता है, किन्तु उसे काम नही मिलता। अर्थात् जो शारीरिक व मानसिक दृष्टि से काम करने की क्षमता रखता है एव काम करना चाहता है परन्तु उसे कार्य नहीं मिलता 187 अथवा काम से अलग होने के लिए बाध्य किया जाता है। वर्तमान में बेरोजगारी की समस्या विश्व व्यापी समस्या है, किन्तु यहाँ भारत के संदर्भ में विचार करें तो पाते हैं कि भारत में बेरोजगारी विभिन्न रूपों में पायी जाती है। जब काम ढूँढने पर भी लोगों को काम नहीं मिलता है तो ऐसी स्थिति को खुली बेरोजगारी कहते हैं। व्यवसाय में नियुक्त ऐसी जन शक्ति के कुछ भाग को, जब उस क्षेत्र से हटाकर किसी अन्य व्यवसाय में लगा दिया जाता है तो भी उससे व्यवसाय के कुल उत्पादन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इस प्रकार की बेरोजगारी को अदृश्य बेरोजगारी कहते हैं। जब किसी व्यक्ति को वर्ष के किसी विशिष्ट समय के लिए रोजगार मिले और वह शेष अवधि के लिए बेरोजगार बैठा रहे तो वह मौसमी बेरोजगारी कहलाती है। मंदी के दिनों में प्रभावपूर्ण माँग में कमी के कारण जो बेरोजगारी फैलती है, उसे चक्रीय बेरोजगारी कहते हैं। इनके अतिरिक्त अस्थिर बेरोजगारी, शिक्षित बेरोजगारी तथा तकनीकी बेरोजगारी भी भारत में देखी जा सकती है। जनसंख्या की वृद्धि को भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख कारण माना जाता है। देश में प्रतिवर्ष जिस दर से जनसंख्या बढ़ रही है, पर रोजगार के अवसर उसी अनुपात में नहीं बढ़ रहे हैं। यद्यपि भारत एक कृषि प्रधान देश है तथापि भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के कारण अतिरिक्त रोजगार के अवसरों का सृजन बहुत कम है। साथ ही भारत के विविध प्राकृतिक साधन अभी तक अविकसित होने से कृषि एवम् औद्योगिक विकास धीमी गति से हो रहा है। पारिवारिक और सामाजिक कारणों के कारण लोग अपना निवास छोड़कर अन्यत्र जाना पसंद नहीं करते जिससे भारतीय श्रम भी गतिहीनता का शिकार हो गया है। दरिद्रता और बेरोजगारी का तो मानो चोली दामन का साथ है। एक व्यक्ति गरीब है क्योंकि वह बेरोजगार है तथा वह बेरोजगार है इसलिए गरीब है। वर्तमान दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली भी विद्यार्थियों को रचनात्मक कार्यौं में लगाने, स्वावलम्बी बनाने तथा आत्मविश्वास पैदा करने में असफल रही है। फलतः आज पढ़ा लिखा व्यक्ति रोजगार के लिए मारा-मारा फिर रहा है। भारत में माँग व प्रशिक्षण की सुविधाओं में समन्वय के अभाव में कई विभागों में प्रशिक्षित श्रमिकों की कमी है। उक्त कारणों के अतिरिक्त भारत में विद्युत की कमी, परिवहन की असुविधा, कच्चा माल तथा औद्योगिक अशान्ति के कारण नये उद्योग स्थापित नहीं हो रहे हैं, वहीं उत्पादन में तकनीकी विधियों को लागू करने से भी बेरोजगारी में वृद्धि हो रही है। हस्त व लघु उद्योगों की अवनति, त्रुटिपूर्ण नियोजन, यन्त्रीकरण एवं अभिनवीकरण, स्त्रियों द्वारा नौकरी करना, विदेशों से भारतीयों का आगमन आदि कारण भी बेरोजगारी समस्या के लिए उत्तरदायी हैं। बेरोजगारी की समस्या समाज में आज अत्यन्त भयंकर एवं गम्भीर समस्या बन गयी है। देश का शिक्षित एवं बेरोजगार युवक अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति हड़तालें करने, बसें जलाने एवं राष्ट्रीय सम्पत्ति को क्षति पहुँचाने में कर रहा है वहीं कई बार वह कुंठित हो आत्महत्या जैसा भयंकर कुकृत्य कर बैठता है। कहते हैं खाली दिमाग शैतान का घरकहावत को हमारे युवक चरितार्थ कर रहे हैं। सच भी है मरता क्या नहीं करता, आवश्यकता सब पापों की जड़ है, अतः वह चोरी, डकैती, अपहरण, तस्करी, आतंकवादी गतिविधियों में सक्रिय हो रहा है। देश की जनशक्ति का सदुपयोग नहीं हो रहा है, फलतः आर्थिक ढाँचा चरमरा रहा है। भारत जैसे विकासशील देश को अपनी बेरोजगारी के उन्मूलन हेतु सर्वप्रथम जनसंख्या नियन्त्रण कार्यक्रम को हाथ में लेकर परिवार नियोजन, महिला शिक्षा, शिशु स्वास्थ्य के कार्य अपनाने होंगे। कृषि विकास के लिए शोध गति से विस्तार एवं कृषि में उन्नत बीजों को अपनाना होगा। नियोजन की प्रभावी नीति, पिछड़े क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना, कुटीर एवं लघु उद्योगों का विकास किया 188 जाना चाहिए तथा उन्हें कच्चा माल, औजार, लाइस स व अन्य आधार भूत सुविधाएँ उपलब्ध करानी चाहिए। सरकार द्वारा विद्युत आपूर्ति, परिवहन सम्बन्धी अड़चन द र करने का प्रयत्न किया जाय। वर्तमान शिक्षा पद्धति को रोजगारोन्मुख बनाए जाने की महती आवश्यकता है। यदि माध्यमिक शिक्षा के बाद औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थाओं तथा अन्य तकनीकी संस्थाओं की अधिकाधिक स्थापना कर युवकों को प्रशिक्षित कर वित्त, कच्च माल व विपणन की सुविधा देकर स्वरोजगार के लिए प्रोत्साहित किया जाय तो इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता। साथ ही प्राकृतिक साधना ं का सर्वेक्षण, गाँवों में रा जगारोन्मुख नियोजन, युवा शक्ति का उपयोग किया जाना चाहिए। वैस सरकार की आ र स इस दिशा में प्रयत्न हेतु एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। इस विश्व व्यापी समस्या के समाधान हेतु उपाय अपने अपने देश की परिस्थितियों के अनुसार ही सार्थक, प्रभावशाली एवं उचित सिद्ध हा ंगे। केवल सरकारी योजनाओं से इसका निराकरण स भव नहीं होगा। आवश्यकता है-इस हेतु युवका ं को ही आगे आकर अपने लिए मार्ग का निर्धारण करना हा गा। हाथ पर हाथ धरे बैठे रहन से कुछ होने का नहीं। नौकरी के लिए भटकने की अपेक्षा अपनी रुचि उद्या गा क प्रति जाग्रत करनी होगी, तभी इसका कोई स्थायी समाधान हो सकेगा, अन्यथा नहीं।


आजादी के बाद : क्या खोया-क्या पाया? : हिंदी निबन्ध



समय के भाल पर भारतीय आजादी का 50 वाँ सूरज उदित हुआ तो देश के प्रबुद्ध लोग  विगत 50 वर्ष की समीक्षा करने लगे। राजनीतिज्ञों का अपना नजरिया है, तो समाजशास्त्री अपने  ढंग से सोच रहे हैं। अर्थशास्त्रियों का अपना दृष्टिकोण है, तो वैज्ञानिकों की सोच कुछ और।  संत पुरुषों की अपनी अवधारणा है तो आम आदमी का अपना मत है। इन सब के चिन्तन का  आकलन कर कुछ निष्कर्ष प्रस्तुत किए जा सकते हैं। इस प्रस्तुति में बहुत अन्तर रह सकता है,  पर कुछेक कटु सच्चाइयाँ वर्तमान का बड़ा सच है, जिसके निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता  है कि आज हम जिस युग में जी रहे हैं उसमें नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों का हृास इतनी तीव्र  गति से हुआ कि सामाजिक स्तर पर हमें निराशा का गहरा कुहासा झेलना पड़ रहा है, जिसमें  हमें सही राह दिखायी नहीं दे रही है। धर्म के स्तर पर कर्मकाण्डी कठमुल्लापन; राजनीति के  स्तर पर स्वार्थता; समाज के स्तर पर संकीर्णता, व्यक्ति के स्तर पर अधिकार लिप्सा आदि ऐसे  तत्त्व हैं जिन्होंने समूचे जीवन को अराजकता के चैराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है।  साम्प्रदायिकता का भयावह खेल चल रहा है; जातिगत सीमाएँ और ज्यादा सिकुड़ती जा रही हैं,  अपनी व्यक्तिगत एषणाओं की पूर्ति के लिए लोग सभी प्रकार के आदर्शों की बलि चढ़ा रहे हैं,  व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि की दौड़ में सभी भागे जा रहे हैं।  कश्मीर, पंजाब और असम में साम्प्रदायिकता तथा आतंकवाद का बोलबाला है; क्षेत्रीयता और  भाषा की समस्याएँ फण फैलाए समाज को लीलने का प्रयास कर रही है महँगाई और ब रोजगारी  द्रा पदी के चीर से होड़ कर रही है; जनस ा वृद्धि का दौर जारी है। वह दिनदुनी रात चैगुनी  सुरसा के मुँह की नाँईं बढ़ रही है; साम्प्रदायिकता की अमर ब ल विष बेल बन कर फैल रही  है; जातीयता के नाम पर साम हिक हत्याऑ का न गा नाच हो रहा है, भ्रष्टाचार का बाजार गर्म  है, तस्करी व काला बाजारी आदि आग में घी का काम कर रहे है ।  भारत विदेशी ऋण क बोझ से दबा जा रहा है, आर्थिक दृष्टि स हमारी रीढ़ की हड्डी  ही टूट चुकी है। पेप्सी कोला संस्कृति का बोल बाला है। पूँजीवादी युग का ‘प टेंट कानून’ पनप  रहा है, बढ़ता हुआ औद्योगिकीकरण मजदूरों का हक छीन रहा है, महानगरा का विस्तार खेता  को लील रहा है। झा पड़ पट्टियों की बगल में भव्य इमारत खड़ी हा रही है दा जून की रोटी  हेतु ज ते बाल श्रमिक शोषण की चक्की  पिस रहे हैं, सार्वजनिक उद्योग दिन-ब-दिन घाटे  में जा रहे हैं तथा बोझ बन गये है । कहने को स्वराज्य मिला किन्तु सुराज्य की स्थापना नहीं  हुई। गाँवा की स्थिति आज भी वैसी ही है। कविवर रामधारी सि ह ‘दिनकर’ न यथार्थ चित्रांकन  करते हुए लिखा है-
‘‘वह स सार जहाँ पर अब तक पहुँची नही किरण है।
जहाँ क्षितिज है मौन और यह अम्बर तिमिर वरण है।

देख जहाँ का दृश्य, आज भी अन्तस्तल हिलता है।
माँ को लज्जा वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है।’’
देख जहाँ का दृश्य, आज भी अन्तस्तल हिलता है। माँ को लज्जा वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है।’’ यह तो सिक्क का एक पहलू हुआ कि हमने क्या खा ा ? आइये उसके दूसरे पहलू को भी देखलें कि हमने इन 50 वर्षों में क्या पाया है। आजादी के बाद अनेकानेक नकारात्मक दवाबा व चुनौतियों तथा विद आक्रमणा ं के बावजूद भारतीय ला कतन्त्र पड़ोसी राज्यों की तरह असफल नही हुआ है, बल्कि आज भी अपनी निज गरिमा के साथ विश्व रंगमंच पर स्थापित है तथा दिन-ब-दिन प्रगति के पथ पर अग्रसर है। चाहे वह प्रतिरक्षा का क्षेत्र हो या विज्ञान तकनीक या औद्योगिक परिदृश्य एवं शिक्षा के विकास का। अपनी उपलब्धियों के निरन्तर गतिमान चक्र क सहारे आज भारत विश्व की 6 बड़ी अर्थ व्यवस्थाओ म ं से एक है। आज हम खाद्यान्न उत्पादन मेंयदि आत्म निर्भर है तो औद्योगिक आधार म पर्याप्त विस्तार क साथ ही हम बुनियादी तथा प ँजीगत दोना प्रकार क उद्योगो म काफी हद तक आत्मनिर्भरता प्राप्त कर चुक है । हम युद्ध के हामी नहीं रह है किन्तु हमने पड़ोसी देश की नाकाम एवं नापाक कोशिशों का मुँह ता ड़ जवाब दिया है। हमारी सीमाएँ सुरक्षित हैं। हम उन चुनिन्दा देशों में से एक है जिनक पास अपने सैटेलाइट बनाने एवं उन्हें अन्तरिक्ष मेंछोड़ने की क्षमता है। पोकरण मेंएक के बाद एक परमाणु विस्फोट कर भारत विश्व पटल पर एक परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र बन गया है। आज भारत का लोकतन्त्र विश्व का सबसे बड़ा व सफल लोकतन्त्र माना जाता है। दुग्ध उत्पादन में भारत प्रथम स्थान पर आ गया है। भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी शिक्षा प्रणाली वाला देश बन गया है तथा उत्तरा त्तर शिक्षा का विकास हो रहा है। परिवहन, विद्युत उत्पादन, दूर स चार आदि क्ष ों में प्रशंसनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं। भारतीय रेल विश्व की तीन बड़ी रेल सेवाओं में से एक है। ‘एयर इण्डिया’ विश्व की प्रतिष्ठित विमानन सेवा है। किसी राष्ट्र के निर्माण में 50 वर्ष का समय कोई लम्बा समय नहीं है। वास्तव में राष्ट्र निर्माण एक ऐसा कार्य है जिसकी सीमाएँ बढ़ती रहती हैं। आगे का रास्ता अभी बहुत लम्बा है इसलिए हमें अभी बहुत से काम पूरे करने हैं। जिस गरीबी की दशा में देश के लाखों लोग रह रहे हैं उसे मिटाना है। आर्थिक और सामाजिक असमानता जो दीवार बनकर एक मनुष्य को दूसरे से अलग कर रही है उसे हटाने की आवश्यकता है। वंचितों को सबल बनाने हेतु महात्मा गाँधी के कार्यौं को आगे बढ़ा ‘रामराज्य’ के सपने को साकार करना है। अतः आवश्यकता है सारे देश को एकजुट होकर विकास के चक्र को आगे बढ़ाने की, सबको संगठित होकर समर्पण की भावना के साथ इस महान् देश को उसकी नियति तक ले जाने का संकल्प लेने की, युवाओं को आगे आने तथा नेताओं को अपने आचरण में उदात्त मूल्यों की स्थापना कर भारत को पुनः सोने की चिडि़या बनाने की।देख जहाँ का दृश्य, आज भी अन्तस्तल हिलता है। माँ को लज्जा वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है।’’ यह तो सिक्क का एक पहलू हुआ कि हमने क्या खा ा ? आइये उसके दूसरे पहलू को भी देखलें कि हमने इन 50 वर्षों में क्या पाया है। आजादी के बाद अनेकानेक नकारात्मक दवाबा व चुनौतियों तथा विद आक्रमणा ं के बावजूद भारतीय ला कतन्त्र पड़ोसी राज्यों की तरह असफल नही हुआ है, बल्कि आज भी अपनी निज गरिमा के साथ विश्व रंगमंच पर स्थापित है तथा दिन-ब-दिन प्रगति के पथ पर अग्रसर है। चाहे वह प्रतिरक्षा का क्षेत्र हो या विज्ञान तकनीक या औद्योगिक परिदृश्य एवं शिक्षा के विकास का। अपनी उपलब्धियों के निरन्तर गतिमान चक्र क सहारे आज भारत विश्व की 6 बड़ी अर्थ व्यवस्थाओ म ं से एक है। आज हम खाद्यान्न उत्पादन मेंयदि आत्म निर्भर है तो औद्योगिक आधार म पर्याप्त विस्तार क साथ ही हम बुनियादी तथा प ँजीगत दोना प्रकार क उद्योगो म काफी हद तक आत्मनिर्भरता प्राप्त कर चुक है । हम युद्ध के हामी नहीं रह है किन्तु हमने पड़ोसी देश की नाकाम एवं नापाक कोशिशों का मुँह ता ड़ जवाब दिया है। हमारी सीमाएँ सुरक्षित हैं। हम उन चुनिन्दा देशों में से एक है जिनक पास अपने सैटेलाइट बनाने एवं उन्हें अन्तरिक्ष मेंछोड़ने की क्षमता है। पोकरण मेंएक के बाद एक परमाणु विस्फोट कर भारत विश्व पटल पर एक परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र बन गया है। आज भारत का लोकतन्त्र विश्व का सबसे बड़ा व सफल लोकतन्त्र माना जाता है। दुग्ध उत्पादन में भारत प्रथम स्थान पर आ गया है। भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी शिक्षा प्रणाली वाला देश बन गया है तथा उत्तरा त्तर शिक्षा का विकास हो रहा है। परिवहन, विद्युत उत्पादन, दूर स चार आदि क्ष ों में प्रशंसनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं। भारतीय रेल विश्व की तीन बड़ी रेल सेवाओं में से एक है। ‘एयर इण्डिया’ विश्व की प्रतिष्ठित विमानन सेवा है। किसी राष्ट्र के निर्माण में 50 वर्ष का समय कोई लम्बा समय नहीं है। वास्तव में राष्ट्र निर्माण एक ऐसा कार्य है जिसकी सीमाएँ बढ़ती रहती हैं। आगे का रास्ता अभी बहुत लम्बा है इसलिए हमें अभी बहुत से काम पूरे करने हैं। जिस गरीबी की दशा में देश के लाखों लोग रह रहे हैं उसे मिटाना है। आर्थिक और सामाजिक असमानता जो दीवार बनकर एक मनुष्य को दूसरे से अलग कर रही है उसे हटाने की आवश्यकता है। वंचितों को सबल बनाने हेतु महात्मा गाँधी के कार्यौं को आगे बढ़ा ‘रामराज्य’ के सपने को साकार करना है। अतः आवश्यकता है सारे देश को एकजुट होकर विकास के चक्र को आगे बढ़ाने की, सबको संगठित होकर समर्पण की भावना के साथ इस महान् देश को उसकी नियति तक ले जाने का संकल्प लेने की, युवाओं को आगे आने तथा नेताओं को अपने आचरण में उदात्त मूल्यों की स्थापना कर भारत को पुनः सोने की चिडि़या बनाने की।

14 August, 2014

दिमाग बढ़ाने वाले 9 मसाले



हल्दी इसमें मौजूद करक्यूमिन यौगिक मस्तिष्क को ऑक्सीकरण से बचाता है और बच्चों का दिमाग तेज करता है।

जीरा बिज हो, चाहे पाउडर के रूप में, यह स्मरण शक्ति बढाने में मदद करता है। इसे सूप, ब्रेड, सब्जियों और सोसेज में पाउडर के रूप में डाल कर use में लेते है।

तेजपात यह थोड़ी मात्रा में ही स्मरण शक्ति बढाने और मस्तिष्क के सही ढंग से काम करने में लाभदायक है। संज्ञात्मक क्रियोंओ में मदद करता है।

काली मिर्च इसका पिपेरिन यौगिक बीटा इंडोरफिन्स का स्तर उच्चा उठता है। संज्ञात्मक क्रियोओ के उचित निष्पादन के लिए मस्तिष्क की मदद करती है।

लौंग यह मस्तिष्क की ताकत को बढाती है और ओक्सीडेतिव स्ट्रेस को कम करती है। इसमें काफी एंटीओक्सीडेट्स पाए जाते है।

तुलसी इस खास पोधे में पाए जाने वाला मिथेनोल, प्रमस्तिष्क संचार में गिरावट के कारण मस्तिष्क को होने वाले नुकसान को कम करने में कारगर है।

दालचीनी इसमें मौजूद तत्व यादास्त बढाने में काफी मदद कर सकते है। इसलिए दालचीनी के नियमित प्रयोग से भूलने की बीमारी भी कम हो जाती है।

जायफल इसका माईरिस्तिसिन यौगिक भी दिमाग को तेज बनाता है और उसे काफी ताकत भी मिलती है। दूध में चुटकी भर जायफल पाउडर डालकर इस्तेमाल करें।

ओरीगेनो इसकी थोडीसी मात्रा ही मस्तिष्क स्वस्थ रखती है। इसके use से mud भी अच्छा रखने में मदद मिलती है। फ्लेवर के लिए इस हर्ब को इस्तेमाल करें।

Computer Tipsआपके ब्राउज़र की History नहीं बनेगी
क्या आप चाहते है कि आप इन्टरनेट पर जो भी सर्च करें और जो भी पासवर्ड लगाए या जो भी वेबसाइट खोले उसकी जानकारी आप के कंप्यूटर या ब्राउज़र में सेव ना रहे तो ऐसा हो सकता है। और इस की सहायता से आप को अनचाहे वायरस से भी छुटकारा मिल जाएगा।..
 
ऑनलाइन पैसे कैसे कमायेंब्लॉग कैसे बनाये और कैसे पैसे कमायें
एक सफल वेबसाइट बनाने के लिए आपको उस पर रोजाना पोस्ट करते रहना पड़ेगा। आपको उसको रोजाना अपडेट करते रहना पड़ेगा। लोगों को उनकी इच्छानुसार पोस्ट देनी पड़ेगी। आजकल इन्टरनेट पर..
 

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